🪶पंख कथा

भुजंग (कोतवाल / Drongo) — निडर पहरेदार, बेहतरीन नक़लची

भुजंग — जिसे उत्तर भारत में ‘कोतवाल’ और अंग्रेज़ी में ‘ब्लैक ड्रोंगो’ (वैज्ञानिक नाम: Dicrurus macrocercus) कहा जाता है — भारतीय खेतों का सबसे परिचित काला पक्षी है। कैंची जैसी लंबी पूँछ, चमकीला काला शरीर, और चौकीदार वाला रवैया — इसीलिए ‘कोतवाल’ नाम पड़ा। यह अपने से दस गुना बड़े बाज़ पर भी बेधड़क हमला कर देता है।

आवाज़ कैसी है: तेज़ धातु-जैसी ‘चिक-चिक-चिर्र’ — तार पर बैठा पहरेदार की पुकार
आवाज़ का विवरण (transcript)

भुजंग / कोतवाल की आवाज़ तेज़ धातु-जैसी ‘चिक-चिक-चिर्र’ — तार पर बैठा पहरेदार की पुकार इस रिकॉर्डिंग में आप उसी विशिष्ट पुकार को साफ़ सुन सकते हैं, जिससे भुजंग / कोतवाल (Black Drongo) को दूर से भी पहचाना जा सकता है।

रिकॉर्डिंग: Xeno-canto / Wikimedia Commons (CC-BY-SA)

कोतवाल की पहचान

भुजंग लगभग 28 सेमी लंबा और 40–50 ग्राम का होता है। पूरा शरीर चमकीला काला-नीला, आँख गहरी लाल-भूरी, चोंच नुकीली और मज़बूत, और सबसे ख़ास — पूँछ का ‘V’ आकार यानी अंग्रेज़ी के अक्षर की तरह गहरा कटाव। नर-मादा एक जैसे दिखते हैं। युवा पक्षी की छाती पर हल्के सफ़ेद धब्बे होते हैं।

‘कोतवाल’ नाम क्यों पड़ा

पुराने ज़माने में गाँव के पहरेदार को ‘कोतवाल’ कहते थे। यह पक्षी ठीक वैसे ही अपने इलाक़े की चौकसी करता है — तार पर बैठा दूर तक नज़र रखता है, कोई ख़तरा दिखते ही तेज़ आवाज़ लगाकर पूरे इलाक़े को सतर्क कर देता है, और घुसपैठिए पर सीधे हमला बोल देता है। इसीलिए हिंदी-भाषी इसे कोतवाल कहते हैं।

बाज़ को भी नहीं छोड़ता

कोतवाल का साहस अद्भुत है। यह अपने से 10 गुना बड़े शिकरा, चील, बाज़, कौवे और यहाँ तक कि सर्प-चील पर भी हमला कर देता है। एक बार निशाना बना ले तो उनका पीछा तब तक करता है जब तक वे इलाक़ा छोड़कर नहीं जाते। इसी सुरक्षा के कारण अक्सर बुलबुल, फ़ैंटेल और छोटे कबूतर कोतवाल के पेड़ के पास घोंसला बनाते हैं — शिकारी उधर आते ही नहीं।

30 आवाज़ों का नक़लची

भुजंग एक शानदार नक़लची है — यह बाज़, बुलबुल, कोयल, मैना, नीलकंठ, गिलहरी और यहाँ तक कि कुत्ते के भौंकने की भी सटीक नक़ल कर सकता है। कई बार यह जान-बूझकर बाज़ की आवाज़ निकालकर दूसरे पक्षियों को डरा देता है — वे अपना खाना छोड़कर भागते हैं, और भुजंग वो खाना चुरा लेता है। इसे ‘क्लेप्टो-पैरासिटिज़्म’ कहते हैं।

खान-पान और किसान का मित्र

कोतवाल पूरी तरह कीट-भक्षी है। टिड्डे, भँवरे, दीमक, तितली, पतंगे, मक्खी — सब खा जाता है। एक कोतवाल दिन-भर में 100 से ज़्यादा कीड़े पकड़ लेता है। यही कारण है कि किसान इसे ‘फ़सल का दोस्त’ मानते हैं। जब खेतों में मवेशी चरते हैं, कोतवाल उनकी पीठ पर बैठकर उड़ते कीड़े पकड़ लेता है।

प्रजनन और घोंसला

अप्रैल-अगस्त प्रजनन काल है। नर-मादा मिलकर काँटेदार टहनी के सिरे पर पतला कप-आकार का घोंसला बुनते हैं — जगह ऐसी होती है कि सर्प या बंदर वहाँ पहुँच ही न सके। मादा 3–4 लाल-चित्तीदार अंडे देती है। दोनों माता-पिता अंडे सेते हैं और चूज़ों को खिलाते हैं। घोंसले पर आने वाले किसी भी पक्षी पर बिना डरे हमला बोलते हैं।

सांस्कृतिक महत्व

‘भुजंग’ शब्द संस्कृत ‘भुजङ्ग’ (साँप) से जुड़ा है — इसकी लहराती पूँछ को साँप जैसा माना गया। कवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ में इसका उल्लेख किया है। लोक-मान्यता में इसका पेड़ पर बैठना ‘घर की सुरक्षा’ का शुभ संकेत माना जाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भुजंग और कोतवाल क्या एक ही पक्षी है?

हाँ। ‘भुजंग’, ‘कोतवाल’ और ‘काला ड्रोंगो’ — तीनों एक ही पक्षी (Dicrurus macrocercus) के नाम हैं। खेतों में अकेले बैठा काला, कैंची जैसी पूँछ वाला पक्षी यही है।

कोतवाल पक्षी बाज़ पर हमला क्यों करता है?

कोतवाल अपने घोंसले और इलाक़े का बहुत आक्रामक रक्षक है। यह अपने से 10 गुना बड़े बाज़, कौवे और चीलों तक पर हमला कर देता है। इसीलिए दूसरे छोटे पक्षी अक्सर कोतवाल के पेड़ के पास घोंसला बनाते हैं — मुफ़्त सुरक्षा।

क्या कोतवाल दूसरे पक्षियों की आवाज़ निकाल सकता है?

हाँ। कोतवाल कम-से-कम 30 दूसरे पक्षियों की आवाज़ की सटीक नक़ल कर सकता है — बाज़, बुलबुल, कोयल, मैना और यहाँ तक कि गिलहरी की भी। धोखे से दूसरे पक्षियों को उनका खाना छोड़कर भागने पर मजबूर कर देता है।

भुजंग की कैंची जैसी पूँछ क्यों होती है?

पूँछ का ‘V’ आकार उड़ान में तेज़ मोड़ लेने में मदद करता है — खेतों के ऊपर से उड़ते कीड़ों को पकड़ते समय। इसी कारण भुजंग बीच हवा में शानदार करतब दिखा सकता है।

कोतवाल क्या खाता है?

कोतवाल पूरी तरह कीट-भक्षी है — टिड्डे, भँवरे, मधुमक्खी, तितली, पतंगे और छोटी छिपकलियाँ। यह किसानों का बड़ा मित्र है क्योंकि फ़सल के कीड़े इसका भोजन है।

कोतवाल कहाँ मिलता है?

पूरे भारत में — खेतों की मेढ़, तार, कंटीली झाड़ी, गाँव के बाग़ीचे। 2000 मीटर तक की ऊँचाई पर भी। यह भारत के सबसे आम पक्षियों में से एक है।

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