🪶पंख कथा

मैना के बारे में जानकारी — पहचान, बोली और रोचक तथ्य

मैना (अंग्रेज़ी: Common Myna, वैज्ञानिक नाम: Acridotheres tristis) भारत के हर शहर, गाँव, खेत और बग़ीचे में मिलने वाली एक बेहद जुगाड़ू, बातूनी और ज़िद्दी चिड़िया है। यह इंसानों के साथ रहने में इतनी माहिर है कि दुनिया के ‘100 सबसे आक्रामक विदेशी प्रजातियों’ में इसका नाम आता है — क्योंकि यह जहाँ भी गई, वहाँ बस गई। इस पेज पर मैना की पहचान, आवाज़, खान-पान, प्रजनन, ‘पहाड़ी मैना’ का इंसान की तरह बोलना और सांस्कृतिक महत्व — सब कुछ मिलेगा।

आवाज़ कैसी है: तेज़ ‘चर्र-चर्र’ और सीटी जैसी बातचीत — जोड़ी की परिचित पुकार
आवाज़ का विवरण (transcript)

मैना की आवाज़ तेज़ ‘चर्र-चर्र’ और सीटी जैसी बातचीत — जोड़ी की परिचित पुकार इस रिकॉर्डिंग में आप उसी विशिष्ट पुकार को साफ़ सुन सकते हैं, जिससे मैना (Common Myna) को दूर से भी पहचाना जा सकता है।

रिकॉर्डिंग: Xeno-canto / Wikimedia Commons (CC-BY-SA)

मैना की पहचान

कॉमन मैना लगभग 23 सेमी लंबी और 110 ग्राम की होती है। सिर काला-चमकीला, शरीर चॉकलेटी-भूरा, आँख के पीछे चमकीली पीली त्वचा (patch), चोंच और पैर पीले, पंखों पर सफ़ेद धब्बा जो उड़ते वक़्त साफ़ दिखता है। नर और मादा दिखने में एक जैसे होते हैं।

मैना कहाँ रहती है

मैना मूल रूप से दक्षिण एशिया की है, पर आज ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, अफ़्रीका और अरब देशों तक फैल गई है। भारत में यह मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाक़ों में — 3000 मीटर की ऊँचाई तक — मिलती है। शहर की सड़कें, पार्क, खेत, कूड़े के ढेर, रेलवे प्लेटफ़ॉर्म — सब इसके पसंदीदा ठिकाने हैं।

बातूनी स्वभाव और आवाज़

मैना दिन-भर बातें करती है — चीं-चीं, टिक-टिक, सीटी, चर्र-चर्र। जोड़ा एक-दूसरे से लगातार बात करता है। पहाड़ी मैना (Hill Myna / Gracula religiosa) की आवाज़ नक़ल करने की क्षमता तोते से भी बेहतर मानी जाती है — यह इंसान के शब्दों, हँसी, फ़ोन की घंटी और कुत्ते के भौंकने तक की सटीक नक़ल कर सकती है।

खान-पान — सच्ची जुगाड़ू

मैना सर्वाहारी है — कीड़े, टिड्डे, केंचुए, फल, अनाज, फूलों का रस, दूसरे पक्षियों के अंडे, कूड़े में फेंका खाना। यही ‘कुछ भी खा लेने’ की आदत इसे शहरों में इतना सफल बनाती है।

प्रजनन और घोंसला

मार्च से सितंबर तक प्रजनन काल है। मादा 4–6 नीले अंडे देती है। घोंसला पेड़ की खोखली शाखा, दीवार के छेद, वेंटिलेटर, एसी के पीछे — कहीं भी बना लेती है। नर-मादा दोनों अंडे सेते हैं और चूज़ों को खिलाते हैं। मैना जीवन-भर के लिए जोड़ा बनाती है।

सांस्कृतिक महत्व

भारतीय लोक-कथाओं और कव्वालियों में ‘मैना’ का नाम प्रेमिका के रूप में अक्सर आता है — ‘तोता-मैना की कहानी’ हर बच्चे ने सुनी है। संस्कृत में इसे ‘सारिका’ कहा गया है और कालिदास ने अपने काव्य में इसका उल्लेख किया है। दक्षिण भारत में इसे ‘नाकनवाल’ और बांग्ला में ‘शालिक’ कहते हैं।

क़ानूनी स्थिति

भारत में कॉमन मैना और पहाड़ी मैना — दोनों वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची के तहत संरक्षित हैं। इन्हें पिंजरे में पालना, बेचना या पकड़ना अपराध है। जुर्माना और जेल — दोनों हो सकते हैं। अगर पालतू पक्षी चाहिए तो बजरीगर या कॉकटिएल जैसी विदेशी पालतू प्रजातियाँ ही क़ानूनी विकल्प हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मैना कितने साल जीती है?

जंगली मैना औसतन 4 साल जीती है, लेकिन सुरक्षित पिंजरे में 12–15 साल तक जी सकती है। पहाड़ी मैना (Hill Myna) 20–25 साल तक भी जिए हैं।

क्या मैना इंसानों की तरह बोल सकती है?

हाँ। ख़ासकर ‘पहाड़ी मैना’ (Gracula religiosa) इंसानी आवाज़ की नक़ल इतनी सटीक करती है कि तोते से भी बेहतर मानी जाती है। कॉमन मैना भी कई तरह की सीटी और शब्द दोहरा सकती है।

मैना और कौवा में क्या फ़र्क़ है?

मैना चॉकलेटी-भूरी होती है, आँख के पास पीली त्वचा और पीली चोंच-पैर होते हैं। कौवा पूरी तरह काला (या ग्रे-काला) होता है, चोंच काली। मैना कौवे से छोटी (लगभग 23 सेमी) होती है।

मैना क्या खाती है?

मैना सर्वाहारी है — कीड़े, टिड्डे, केंचुए, फल, अनाज, बचा-खुचा खाना — सब खा लेती है। यही जुगाड़ इसे शहर में सफल बनाता है।

क्या घर में मैना पालना क़ानूनी है?

नहीं। भारत में कॉमन मैना और पहाड़ी मैना — दोनों वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित हैं। इन्हें पिंजरे में पालना अपराध है और इसमें सज़ा हो सकती है।

मैना कहाँ घोंसला बनाती है?

पेड़ों की खोखली शाखाओं, इमारतों के वेंटिलेटर, एसी के पीछे, छत के कोनों में। नर-मादा जोड़े बनाकर रहते हैं और घोंसले की जगह की बड़ी रक्षा करते हैं।

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