प्रवासी पक्षी — सर्दियों में भारत आने वाले मेहमान

हर अक्टूबर से मार्च के बीच भारत की झीलें, तालाब और नमभूमियाँ हज़ारों किलोमीटर दूर से आए मेहमानों से भर जाती हैं। ये प्रवासी पक्षी साइबेरिया, मध्य एशिया, मंगोलिया, तिब्बत और यहाँ तक कि यूरोप से उड़कर आते हैं। इस लेख में जानिए कौन-कौन से पक्षी आते हैं, वे रास्ता कैसे ढूँढ़ते हैं और भारत में उन्हें देखने की सबसे अच्छी जगहें कौन-सी हैं।
प्रवास क्यों होता है
प्रवास भूख से जुड़ा फ़ैसला है, ठंड से नहीं। जब उत्तरी गोलार्ध की झीलें जम जाती हैं तो कीड़े, मछलियाँ और जलीय पौधे पहुँच से बाहर हो जाते हैं। भारत की खुली, गर्म नमभूमियाँ उसी समय भोजन से भरी होती हैं। इसलिए पक्षी ठंड से नहीं, भोजन की तलाश में दक्षिण की ओर उड़ते हैं और गर्मी लौटते ही वापस चले जाते हैं, क्योंकि उत्तर की लंबी गर्मी-दिन उन्हें बच्चों को पालने का ज़्यादा समय देती है।
भारत आने वाले मुख्य प्रवासी पक्षी
साइबेरियन क्रेन (अब लगभग नहीं आता), बार-हेडेड गूज़ (हंस), ग्रेटर फ्लेमिंगो, नॉर्दर्न पिनटेल, कॉमन टील, गडवाल, रुड्डी शेल्डक (सुरखाब), रोज़ी स्टार्लिंग (तिलियर), ब्लू-टेल्ड बी-ईटर, अमूर फ़ाल्कन और डेमोइज़ेल क्रेन (कुर्जां) — ये सब हर साल भारत लौटते हैं। राजस्थान के खीचन गाँव में तो हर सर्दी कुर्जां के हज़ारों झुंड उतरते हैं, जिन्हें गाँववाले खुद दाना खिलाते हैं।
रास्ता कैसे ढूँढ़ते हैं
पक्षी दिशा तय करने के लिए एक साथ कई संकेत इस्तेमाल करते हैं — सूरज की स्थिति, रात में तारों का नक़्शा, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और पहाड़-नदियों जैसे भू-चिह्न। बार-हेडेड गूज़ हिमालय को 7,000 मीटर से ऊपर उड़कर पार करता है, जहाँ ऑक्सीजन आधी से भी कम होती है। अमूर फ़ाल्कन नागालैंड होते हुए एक ही मौसम में लगभग 22,000 किलोमीटर की यात्रा करता है।
कहाँ देखें — भारत की टॉप जगहें
केवलादेव घना (भरतपुर, राजस्थान), चिलिका झील (ओडिशा), पुलिकट और पॉइंट कैलिमेरे (तमिलनाडु), नल सरोवर और थोल (गुजरात), सुल्तानपुर (हरियाणा), मंगलाजोड़ी (ओडिशा), पोंग बांध (हिमाचल), लोकतक (मणिपुर) और खीचन (राजस्थान)। नवंबर के अंत से फरवरी तक की सुबहें सबसे अच्छी रहती हैं।
प्रवासी पक्षियों पर ख़तरे
नमभूमियों का सूखना और उन पर निर्माण, कीटनाशक, बिजली की तारें, रोशनी-प्रदूषण और शिकार — ये पाँच सबसे बड़े ख़तरे हैं। साइबेरियन क्रेन का भरतपुर आना 2002 के बाद बंद हो गया, जो चेतावनी है कि एक भी पड़ाव-स्थल टूटने पर पूरा प्रवास-मार्ग ढह सकता है।
आप क्या कर सकते हैं
स्थानीय तालाब और झील को कचरा-मुक्त रखने की मुहिम से जुड़िए, सर्दियों में झील किनारे ड्रोन और तेज़ संगीत से बचिए, और अपनी हर पक्षी-सूची eBird पर दर्ज कीजिए — यही आँकड़े शोधकर्ताओं को प्रवास-मार्ग बचाने में मदद करते हैं।
✍️ संपादकीय और तथ्य-जाँच नीति
पंख कथा के हर लेख की जानकारी कम-से-कम तीन स्वतंत्र स्रोतों से जाँची जाती है — Bombay Natural History Society (BNHS), eBird / Cornell Lab, और IUCN Red List। स्थानीय लोक-कथाएँ क्षेत्रीय स्रोतों से लेकर स्पष्ट रूप से चिह्नित की जाती हैं। यदि आपको कोई त्रुटि दिखे तो हमें बताइए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रवासी पक्षी भारत कब आते हैं?
अधिकांश प्रवासी पक्षी अक्टूबर के मध्य से आना शुरू होते हैं, नवंबर–जनवरी में संख्या चरम पर होती है और मार्च तक वे लौट जाते हैं।
सबसे ऊँचाई पर उड़ने वाला प्रवासी पक्षी कौन है?
बार-हेडेड गूज़ (पट्टसिर हंस) हिमालय को लगभग 7,000 मीटर से ऊपर उड़कर पार करता है।
क्या साइबेरियन क्रेन अब भी भारत आता है?
पश्चिमी आबादी लगभग समाप्त हो चुकी है; भरतपुर में आख़िरी नियमित दर्शन 2002 में हुआ था।
प्रवासी पक्षी देखने के लिए सबसे अच्छा समय क्या है?
सूर्योदय के बाद के पहले दो घंटे और सूर्यास्त से पहले के दो घंटे — तभी पक्षी सबसे ज़्यादा सक्रिय होते हैं।
क्या प्रवासी पक्षियों को दाना खिलाना चाहिए?
जंगली नमभूमि में नहीं। खीचन जैसे कुछ पारंपरिक स्थलों को छोड़कर, कृत्रिम भोजन पक्षियों को एक जगह भीड़ में इकट्ठा कर देता है जिससे बीमारी फैलने का ख़तरा बढ़ता है।