गिद्ध — भारत का सफ़ाईकर्मी जो लगभग खो गया

तीस साल पहले भारत में गिद्ध इतने आम थे कि किसी मरे मवेशी के आसपास सैकड़ों दिख जाते थे। आज उनका दिखना ख़बर बन जाता है। यह गिरावट किसी शिकार या जंगल-कटाई से नहीं, एक दवा से हुई — और यही इसे दुनिया की सबसे तेज़ पक्षी-गिरावट बनाता है।
भारत के गिद्ध
भारत में नौ प्रजातियाँ मिलती हैं — व्हाइट-रम्प्ड (सफ़ेद पीठ वाला), इंडियन (लंबी चोंच वाला), स्लेंडर-बिल्ड, रेड-हेडेड (राज गिद्ध), इजिप्शियन (सफ़ेद गिद्ध), हिमालयन ग्रिफ़ॉन, यूरेशियन ग्रिफ़ॉन, सिनेरियस और बियर्डेड वल्चर (दाढ़ी वाला गिद्ध)। इनमें से चार अब 'Critically Endangered' हैं।
क्या हुआ था
1990 के दशक के मध्य से गिद्ध रहस्यमय ढंग से मरने लगे। 2003 में शोध ने कारण पकड़ा — डाइक्लोफ़ेनैक, जो पशुओं के दर्द और सूजन में दी जाती थी। जिस मवेशी को मरने से पहले यह दवा दी गई हो, उसका शव खाने वाले गिद्ध को गुर्दे की विफलता हो जाती थी। तीन प्रजातियों की आबादी 97–99.9% तक गिरी।
गिद्ध क्यों ज़रूरी हैं
गिद्ध की आमाशय-अम्लता इतनी तेज़ है कि वह एंथ्रैक्स, रेबीज़ और बोटुलिज़्म जैसे रोगाणुओं को भी नष्ट कर देता है। गिद्धों के ग़ायब होते ही मवेशियों के शव जंगली कुत्तों और चूहों के हवाले हो गए, जिससे कुत्तों की आबादी और रेबीज़ के मामले बढ़े। कई अध्ययनों ने इस गिरावट को भारत में मानव स्वास्थ्य पर पड़ी भारी आर्थिक लागत से जोड़ा है।
सांस्कृतिक असर
पारसी समुदाय की 'दोखमा' परंपरा में शव को गिद्धों के लिए खुला रखा जाता है। गिद्धों के ग़ायब होने से मुंबई के टावर ऑफ़ साइलेंस में यह परंपरा संकट में पड़ गई और समुदाय को सौर-सांद्रक जैसे विकल्पों की ओर जाना पड़ा। भारत की कई जनजातीय परंपराओं में भी गिद्ध को 'प्रकृति का सफ़ाईकर्मी' माना गया है, और रामायण का जटायु इसी सम्मान का प्रतीक है।
संरक्षण की कोशिशें
2006 में पशु-चिकित्सा में डाइक्लोफ़ेनैक पर प्रतिबंध लगा और मेलॉक्सिकैम को सुरक्षित विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया गया। पिंजौर (हरियाणा), राजाभटखावा (पश्चिम बंगाल) और रानी (असम) में प्रजनन-केंद्र बने; 2016 से नियंत्रित पुनर्वास (release) शुरू हुआ। 'वल्चर सेफ़ ज़ोन' उन इलाक़ों को कहते हैं जहाँ 100 किमी के दायरे में हानिकारक दवाएँ लगभग शून्य हों।
अभी की स्थिति
गिरावट रुक गई है और कुछ इलाक़ों में संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, पर ख़तरा टला नहीं — केटोप्रोफ़ेन और एसिक्लोफ़ेनैक जैसी कुछ अन्य दवाएँ भी गिद्धों के लिए ज़हरीली पाई गई हैं। गिद्ध साल में एक ही अंडा देता है, इसलिए आबादी की वापसी बेहद धीमी होगी।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में गिद्ध क्यों ख़त्म हुए?
पशुओं को दी जाने वाली डाइक्लोफ़ेनैक दवा के अवशेष से, जिससे शव खाने वाले गिद्धों के गुर्दे नष्ट हो जाते थे।
भारत में गिद्ध की कितनी प्रजातियाँ हैं?
नौ प्रजातियाँ, जिनमें से चार गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) हैं।
क्या डाइक्लोफ़ेनैक अब भी इस्तेमाल होती है?
पशु-चिकित्सा में 2006 से प्रतिबंधित है, पर मानव-उपयोग वाली शीशियों का ग़लत इस्तेमाल अब भी एक चुनौती है।
गिद्ध के जाने से इंसानों को क्या नुक़सान हुआ?
मवेशियों के शव जंगली कुत्तों के हवाले हो गए, जिससे कुत्तों की आबादी और रेबीज़ के मामले बढ़े।
गिद्ध कहाँ देखे जा सकते हैं?
राजस्थान का जोरबीड़ (बीकानेर), मध्य प्रदेश का पन्ना, गुजरात का गिर और हिमाचल-उत्तराखंड की ऊँची घाटियाँ।