कबूतर के बारे में जानकारी — पहचान, स्वभाव और रोचक तथ्य
कबूतर (अंग्रेज़ी: Rock Pigeon, वैज्ञानिक नाम: Columba livia) भारतीय शहरों, रेलवे स्टेशनों, मस्जिदों, मंदिरों और पुरानी इमारतों का सबसे आम पक्षी है। हज़ारों साल से यह इंसानों के साथ रहता आया है — कभी संदेशवाहक, कभी पूजा का हिस्सा, तो कभी बालकनी का अनचाहा मेहमान। इस पेज पर कबूतर की पहचान, स्वभाव, प्रजनन, संदेशवाहक इतिहास और स्वास्थ्य-सावधानियाँ — सब कुछ एक जगह मिलेगा।
आवाज़ का विवरण (transcript)
कबूतर की आवाज़ गहरी ‘गुटर-गूँ’ — नर की कोर्टशिप पुकार, छत पर सबसे परिचित आवाज़ इस रिकॉर्डिंग में आप उसी विशिष्ट पुकार को साफ़ सुन सकते हैं, जिससे कबूतर (Rock Pigeon) को दूर से भी पहचाना जा सकता है।
रिकॉर्डिंग: Xeno-canto / Wikimedia Commons (CC-BY-SA)
कबूतर की पहचान
जंगली रॉक पिजन 32–37 सेमी लंबा और लगभग 300–400 ग्राम का होता है। शरीर स्लेटी-नीला, गर्दन पर हरे-बैंगनी रंग की चमक, पंखों पर दो काली पट्टियाँ और पूँछ के अंत में एक काली पट्टी होती है। आँख नारंगी-लाल और चोंच काली होती है। शहरी कबूतरों में रंग बदलते हैं — सफ़ेद, भूरे, चितकबरे — क्योंकि ये पालतू नस्लों से मिलकर बने हैं।
कबूतर कहाँ रहता है
मूल रूप से कबूतर चट्टानी पहाड़ियों में रहता था, इसलिए नाम पड़ा ‘रॉक पिजन’। इंसानी इमारतें — ऊँची छतें, कोनियाँ, वेंटिलेटर, टावर — इसे उन्हीं चट्टानों जैसी लगीं, और यह पूरी दुनिया के शहरों में फैल गया। यह झुंड में रहता है और सैकड़ों की संख्या में एक साथ दाना चुगता है।
खान-पान
कबूतर पूरी तरह बीज-भक्षी है। बाजरा, गेहूँ, ज्वार, मक्का, चना और मटर इसका प्राकृतिक आहार है। यह अपनी आँतों में छोटे कंकड़ भी निगलता है जिन्हें ‘ग्रिट’ कहते हैं — ये पेट में बीजों को पीसते हैं। शहरी कबूतरों को रोज़ रोटी-चावल खिलाने से उनका पेट ख़राब होता है और वे मोटापे के शिकार होते हैं।
प्रजनन और उम्र
कबूतर साल भर प्रजनन करता है। नर-मादा जीवन-भर के साथी होते हैं। मादा एक बार में 2 सफ़ेद अंडे देती है। दोनों माता-पिता 17–19 दिन तक अंडे सेते हैं। ख़ास बात — दोनों माता-पिता अपनी फ़सल (crop) में एक विशेष तरल ‘क्रॉप-मिल्क’ बनाते हैं और चूज़ों को पिलाते हैं। यह स्तनधारियों के दूध जैसा पौष्टिक होता है।
संदेशवाहक कबूतर का इतिहास
कबूतर की दिशा-ज्ञान क्षमता चौंकाने वाली है। ‘होमिंग पिजन’ 1000 किलोमीटर दूर से भी अपने घर लौट सकता है। मिस्र, यूनान, रोम में सैकड़ों साल पहले इनका उपयोग संदेश भेजने में हुआ। भारत में मुगल दौर में कबूतरों से ख़बरें भेजी जाती थीं। दोनों विश्व-युद्धों में ब्रिटिश और अमेरिकी सेनाओं ने कबूतरों को सैन्य संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया — ‘चेर आमी’ नामक कबूतर ने 200 अमेरिकी सैनिकों की जान बचाई थी। ओडिशा पुलिस के पास आज भी संदेशवाहक कबूतरों की एक दस्ता (Pigeon Service) है।
सांस्कृतिक महत्व
कबूतर शांति का विश्व-प्रतीक है। बाइबिल में नूह की नाव को ज़मीन की ख़बर एक कबूतर ने ही दी थी। इस्लामिक परंपरा में कबूतर को पवित्र माना जाता है — मक्का-मदीना और भारत की जामा मस्जिद जैसे स्थलों पर हज़ारों कबूतर दाना पाते हैं। हिंदू परंपरा में कबूतर घर में घोंसला बनाए तो उसे शुभ माना जाता है।
स्वास्थ्य से जुड़ी सावधानियाँ
कबूतर की सूखी बीट में फफूँद पनप सकती है जो साँस के ज़रिए फेफड़ों तक पहुँचने पर हिस्टोप्लाज़मोसिस, क्रिप्टोकोकोसिस और ‘बर्ड फैंसियर’स लंग’ जैसी बीमारियाँ पैदा कर सकती है। बालकनी और छत को नियमित साफ़ करें, बीट पर पानी छिड़ककर मास्क-दस्ताने पहनकर हटाएँ, और खिड़कियों-वेंटिलेटरों पर जाली लगाएँ ताकि कबूतर घर के अंदर न आ सकें। कबूतरों को दाना डालना है तो अपनी छत पर नहीं — पार्क या दूर की खुली जगह पर डालें।
और पढ़ें — संबंधित ब्लॉग
हिंदी में और पढ़ें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कबूतर कितने साल जीता है?
जंगली कबूतर औसतन 3–5 साल जीता है, लेकिन सुरक्षित वातावरण में 15 साल तक जी सकता है। पालतू फ़ैंसी कबूतर 20 साल तक भी जिए हैं।
कबूतर एक साल में कितने अंडे देता है?
मादा कबूतर हर बार 2 अंडे देती है और साल में 5–6 बार अंडे दे सकती है। अंडों को नर और मादा दोनों बारी-बारी सेते हैं।
क्या कबूतर सचमुच संदेश ले जाते थे?
हाँ। ‘होमिंग पिजन’ प्रजाति को हज़ारों साल पहले से पालतू बनाया गया है। ये पक्षी 1000 किलोमीटर दूर से भी अपने घर लौट सकते हैं। दोनों विश्व-युद्धों में इनका उपयोग सैन्य संदेशों के लिए हुआ।
कबूतर के आस-पास रहने से क्या बीमारी हो सकती है?
कबूतर की बीट (सूखी) से हिस्टोप्लाज़मोसिस, क्रिप्टोकोकोसिस और साइकोसिस जैसी फेफड़ों की बीमारियाँ हो सकती हैं। बालकनी को साफ़ रखें, मास्क पहनकर बीट साफ़ करें और बच्चों-बुज़ुर्गों को दूर रखें।
कबूतर को क्या खिलाना चाहिए?
कबूतर बीज-आधारित पक्षी है — बाजरा, गेहूँ, ज्वार, मक्का, हरा चना और मटर इसके प्राकृतिक आहार हैं। रोटी, चावल और मैदा के तले पदार्थ इसके पेट के लिए हानिकारक हैं।
क्या कबूतर पालना क़ानूनी है?
भारत में देशी रॉक पिजन को पालना क़ानूनी है क्योंकि यह वन्यजीव अधिनियम की अनुसूची में नहीं आता। लेकिन इसे साफ़ जगह, पर्याप्त उड़ान और पशु-चिकित्सक की देख-रेख चाहिए।